my hindi poems

अंतिम दृश्य

दूर रहो मुझसे , मेरे पास मत आना । मुझे छूना मत । वो चिल्ला रही थी , लड़ रही थी । पर, वो थक गई थी । उसकी कोशिश जैसे नम-सी पड़ गई थी । उसकी आंखें धीरे -धीरे बंद हो रही थी । उस वक्त , उसकी आंखों के सामने आ रहे थे कुछ दृश्य । बेटा रात होने से पहले घर आ जाना । माँ ! तुम्हे मुझ पर विश्वास नहीं है! रोज़ -रोज़ एक बात कह कर तुम थक नहीं जाती । ये सुनकर माँ की आंखों में आंसू आ गए , और उसने कहा - बेटा मुझे तुझ पर तो विश्वास है पर इस दुनिया पर नहीं। अपनी बेटी को बांध कर रखीए । किसी दिन आपकी नाक कटा देगी ! तब बाबा ने कहा - आप चिंता मत कीजिए , मेरी शान मेरी नाक में नहीं , मेरी बिटिया रानी में हैं । याद आया उसे वो छोटा भाई , जो वैसे तो छोटी-सी छिपकली से भी डर जाता था , पर रक्षाबंधन के दिन उसे कहता था - दीदी! तू चिंता मत करना , मैं तुझे हर बुराई से बचाऊंगा , मैं तेरी रक्षा करूंगा । ये सुनकर वो मुस्कुरा देती थी। अब सब कुछ धुंधला - सा लग रहा था , उसकी कोशिश बंद हो गई थी । तुमने मेरे साथ जो भी किया , वो किसी ओर माँ की बेटी के साथ मत करना । और मेरी माँ से कहना , उनकी बेटी ने हार नहीं मानी । और ये कह कर वो , हमेशा के लिए चुप हो गई ।

अकेलापन या एकांत?

आप हमारे साथ क्यों नहीं रहना चाहते ? आप हमारे साथ वक्त क्यों नहीं बिताते ? क्या हम इतने बुरे हैं? वो मुझे पूछते हैं । उन्हें कैसे समझाऊँ , लोगों के साथ रहकर भी चुप रहने से बेहतर, मुझे अकेले रहकर मौन रहना अच्छा लगता है । दुनिया के कोलाहल से दूर मुझे एकांत रहना अच्छा लगता है । नए दोस्त बनाओ , उनके साथ बातचीत करो । क्या आपको अकेलापन महसूस नहीं होता ? वो मुझे पूछते हैं । उन्हें कैसे समझाऊँ दूसरों से ज्यादा तो मेरी खुद से अच्छी यारी है । मुखौटों से बेहतर तो एक चेहरा होता है , भीड़ भरी दुनिया से दूर मुझे खुद से मिलना अच्छा लगता है । आप अकेले क्यों रहते हो ? चुप क्यों रहते हो ? आप खुद से बातें क्यों रहते हो ? वो मुझे पूछते हैं । बाहर की उलझनों से दूर मुझे खुद में सुलझे रहना अच्छा लगता है । चुप नहीं होती हूँ , खुद से बातें करती हूँ। मुझे खुद से मिलना अच्छा लगता है । अकेलेपन और एकांत में अंतर है , वो नहीं समझेंगे । एक सुंदर-सा सुकून मुझे एकांत देता है। उन लोगों को बस यही समझाना चाहती हूँ , मैं शांत रहना चाहती हूँ । एकांत चाहती हूँ ।

मेरे आंगन में है आम का पेड़ पुराना

ये तब की बात है , जब हमारा घर ईंटों का नहीं बना था । दादू आंगन मे आए, चुपके से आम खाया , जो उन्होंने अपने स्कूल के साथ वाले बगीचे से था चुराया । पकड़े ना जाए इसलिए गुठली उस कच्चे आंगन की मिट्टी में दबा दी, पर अगले ही दिन परदादाजी को माली से बात पता चली , और दादू की खूब की पिटाई , फिर चोरी ना करने की दादू ने कसम भी खाई। वक्त कब बीत गया पता भी ना चला , आंगन में अब आम का पेड़ खड़ा था । पेड़ के पास खेल रहे थे दो बच्चे, मेरे पापा और चाचू । दोनों के बीच पता नहीं किस बात पर बहस हुई , खूब की लड़ाई । चाचू फिर पेड़ पर चढ़ने लगे , पैर फिसला , चोट लगवाई , रोने की आवाज़ सुन पापा भागते हुए आए, आम के पेड़ को उन्होंने खूब डाँट लगाई । दोनों ने हाथ मिलाया , आम तोड़ा , बाँट कर खाया । ये किस्सा मुझे बहुत बार सुनाया । मैं भी कुछ कम नहीं , बचपन में बहुत करती थी मनमानी । जब मेरी कोई ज़िद पूरी नहीं होती थी , तो सब से रूठ कर मैं आंगन में आ जाती थी । एक दोस्त की तरह आम के पेड़ को सारी कहानी बताती थी । अब दादू भी तारा बन गए है, पापा - चाचू भी नहीं लड़ते , मैं भी नहीं करती मनमानी , लेकिन जब भीड़ भरी ज़िंदगी से दूर , मुझे सुकून चाहिए होता है , तो मैं आंगन में चली जाती हूँ , क्योंकि मेरे आंगन में है आम का पेड़ पुराना , जिस से जुड़ा है हमारी यादों का खज़ाना ।